यह ग्रंथ आदि शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन, उपनिषदों के ऋचा-भाष्य तथा आधुनिक क्वांटम भौतिकी के चेतना संबंधी सिद्धांतों (Non-locality and Quantum Consciousness) का गहन तुलनात्मक और विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है।
प्राक्कथन
अद्वैत वेदान्त की आधारशिला इस मान्यता पर टिकी है कि 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'—अर्थात् दृश्यमान प्रपञ्च मूलतः एक अखंड चैतन्य की ही अभिव्यक्ति है। आधुनिक भौतिकी के नोबेल पुरस्कार विजेता इरविन श्रोडिंगर ने भी वेदान्त के अद्वैत भाव को उपनिषदों के माध्यम से उद्धृत किया था।
अध्याय १: उपनिषदों में चेतना का स्वरूप
माण्डूक्य उपनिषद् में वर्णित जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय अवस्थाएं चेतना के बहुआयामी विस्तार का उद्घाटन करती हैं। 'प्रज्ञानं ब्रह्म' और 'अयमात्मा ब्रह्म' महावाक्य यह रेखांकित करते हैं कि ज्ञाता और ज्ञेय का द्वैत व्यावहारिक है, पारमार्थिक नहीं।
अध्याय २: क्वांटम उलझाव (Entanglement) एवं विवर्तवाद
क्वांटम भौतिकी में 'एन्टैंगलमेंट' यह सिद्ध करता है कि दिक्-काल के दो ध्रुवों पर स्थित कण परस्पर सम्बद्ध हैं। वेदान्त का विवर्तवाद भी यही स्पष्ट करता है कि नाम और रूप केवल उपाधियां हैं।
अध्याय ३: निष्कर्ष एवं वैश्विक प्रासंगिकता
आधुनिक युग में जब मानव भौतिकता की दौड़ में त्रस्त है, यह ग्रंथ भारतीय चिंतन परंपरा की शाश्वत ऊर्जा से पुनः साक्षात्कार कराता है।
उद्धरण संदर्भ (Citation):
प्रो. राधाकृष्णन शास्त्री et al. (2026). "अद्वैत वेदान्त और आधुनिक विज्ञान: चेतना का दार्शनिक स्वरूप". अक्षय प्रकाशन (akshayprakashan.in).